Saturday, December 6, 2014

आदत

आदत, अंग्रेजी में हेबिटयानि किसी क्रिया के पुनः पुनः होने या करने से उसके स्वाभाविक रूप से स्वीकार्य होने को ही शायद आदत कहते हैं, अगर नहीं तो भगवान व पाठक मेरी मानसिक भित्ति की दुर्बलता को क्षमा करें | वैसे आदत बड़ा ही रोचक विषयहमेशा से रहा है और शायद हमेशा रहेगा किन्तु आदत शब्द अपने आप में बड़ा ही नीरस व गैरजिम्मेदाराना प्रतीत होता है क्यूंकि अक्सर इस शब्द के प्रयोग से क्रिया के कारण का लोप अनायास ही हो जाता है | वक्ता के लिए यह दुनियावालों के अनेकानेक प्रश्नों का सदा सरल और यदा कदा आश्वस्त करने वाला रामबाण जवाब 
होता है |

रोज़मर्रा की जिंदगी में जी उनकी तो सुबह उठने की ही आदत है”, “अजी इनकी तो आदत ही है की ये सुबह सिर्फ चाय पीते है ,और दोपहर को दांत माँझ कर सीधे खाना खाते हैं”, “शर्मा जी की तो आदत है की वो दूसरों के फटे में जरूर टांग अड़ाते हैं”, “आपको तो  पता ही है की रमेश आदतन जुआरी हैआदि न जाने कितने ही ऐसे मुहावरे हमसे टकराते हैं और अगर आप आदत होने का कारण लोगों से पूँछ लें तो आपको लोग आपको ऐसे आँखे तरेर कर देखेंगे जैसे आपने उपहास की नियत से ये प्रश्न पूछा हो |
आदत अपने आप में सम्पूर्ण है | इसकी कोई वजह नहीं होती ये बस होती है आप पूरी जान लगा कर कोशिश कर लें क्या मजाल जो आप किसी लॉजिकल कांक्लुजनपर सहमत क्या पहुँच भी पायें तो |

और तो और जन मानस में आदत की वजह न होने का कोंसेप्ट इतना अंडरस्टुड व सर्वमान्य है की महान आर्यावर्त प्रदेश जो की एक बातचीत अथवा चर्चा प्रधान देश है(कृषि प्रधान है या नहीं इस विषय में अधिक जानकारी के लिए अपने नजदीकी आर.टी.आई केन्द्र पर संपर्क करें ), जिसके जन जन में यानि टॉप टू बॉटमअनगिनत नैसर्गिक आदतों का वास है , में आदतचर्चा का विषय नहीं है | आप २४ घंटे के निरंतर सबसे तेज बातचीत करने वाले चैनल्स से लेकर हमारे पुरातन दूभर दर्शनतक खंगाल डालें , इनमें आपको मसालेदार स्टिंग,नारी सशक्तिकरण से लेकर फूहड़ गाने(महिमा मंडित),फलां का शयन कक्ष तक चर्चा का विषय हैं पर आदतगायब है |

इस नाइंसाफी से में व्यथित हुआ और परेशान भी ,मुफ्त में बेज्ज़ती हुई सो अलग ने, असल में हुआ यूँ की अपनी पहुंच के अनुसार मैंने अपने नगर के एक छुटभैये इस एक सवाल कर डाला |
इस पर उसने मुझे डपट कर कहा : अबे ! तू है कौन और ये क्या आदत-
आदतलगा रखा है ,चल भाग यहाँ से |

इसपे उसके एक चेले ने जो पेशे से प्राइवेट गाइड है , ने चुटकी ली : जी आदतनामालिखेंगे जनाब आदतुलफज़ल” |

कभी कभी ये भ्रम भी हुआ की ये आदतको भारतीय संस्कृति की तरह नज़रअंदाज़ करने की शाजिश है |

मैं इसके विरोध में जंतर मंतर जाकर अनशन करने ही वाला था की उसी रात एक वरिष्ठ पत्रकार ने स्वप्न में मुझे दर्शन दिया और फिर से दर्शन’(दर्शनशास्त्र वाला ) दिया |
वे बोले अबे गधे, आदत सर्व्यापक है और तेरी समझ से परे है | तू आदत की चर्चा न होने से परेशान है ,जबकि यहाँ सभी को चर्चा की आदत है | चर्चा , आदत का उपोत्पाद है यानि की एक बाई प्रोडक्ट है और क्या गारंटी है की जिनके साथ मिलकर तू अनशन पर बैठेगा उन्हें अनशन की आदत नहीं है ? यह कह कर वे अंतर्ध्यान हो गए |

मुझे अपने प्रश्न का शायद उत्तर मिला भी और नहीं भी, लेकिन अनशन का खयाल मन से जरूर जाता रहा |

गौर से देखने पे आप पाएंगे कि आदतें बड़ी विविधहोती हैं वैसे इनके वर्गीकरण में तो  कौटिल्य को भी पसीने आ जायेंगे, ये सिर्फ व्यक्ति विशेष की ही नहीं सामूहिक भी हैं जैसे नेताओं की आदत, अभिनेताओं की आदत, समाज सुधारकों की आदत, दुकानदारी की आदत, पडोसियों की आदत | न्यूज़ चैनलों से  लेकर सरकारी आदतें बाज़ार में देखने को आसानी से मिलतीं हैं |

खैर जो भी हो, आदतें हमारे कर्म के रूप में ही दुनिया में आती हैंजिसका सीधा मतलब है की ये हमारा स्वर्ग-नर्क तय कर सकती हैं तो हमे चाहिए कि समय रहते इनको पहचान लें और अपना परलोक बचा लें

Tuesday, December 18, 2012

अफ़सोस


न कोई शौक, न किस्से, न यादें ही रहीं,
बेरंग मुक्कदर से मेरे इश्क भी जाता रहा,
कुछेक जज़्बात ही बचे थे दिल-ए-महरूम में मेरे,
मगर अफ़सोस की उनको भी जुबाँ मैं दे न सका |

न कोई गम, न शिकायत, न शिकवा ही रहा,
वफ़ा-ए-मय से मेरा होश भी जाता रहा ,
चंद अश्क-ए-बर्बाद ही रह गए थे पलकों पे मेरे ,
मगर अफ़सोस की उनको भी पनाह मैं दे न सका |

न कोई चेहरा, न शख्शियत, न हस्ती ही रही,
हरेक आईने से मेरा अक्स भी जाता रहा,
हाँ थे बहुत अफ़सोस इस उम्र-ए-सफर के !
मगर अफ़सोस की उस शर्म को भी मैं धो न सका |

Monday, May 28, 2012

उर्दू कोना


                  "आवारगी"


मिसरा :- आवारगी  इस शख्शियत  में ऐसे फ़ना कुछ हो गयी,
             रंज-ओ-गम भी अब मेरे खानाबदोश हो गए ||

जिंदगी आवारगी की राह पे चलती रही,
कभी बेफिक्र ,कभी बेकस,कभी बेरंग  सी होती रही |

वहम  कितने ही टूटे कांच  से,उतने ही फिर फिर बन गए,
हिम्मत  भी टूटी,पैदा हुए कुछ  शौक भी, (उसकी इनायत )
ज़िल्लत  मगर फिर भी रही और साँस  भी चलती रही |

रास्तों की खाक  कुछ अपनी लगी,कुछ गैर थी, 
बेहिस हुए फ़ितना,कुछ पल  को फुर्सत  भी मिली, 
रहमत  खुदा की भी रही और बेखुदी बढती रही | 

कशमकश  ही कशमकश  ए  कमबख्त फ़ितरत-ए-जिंदगी,
के  ता-उम्र  मौत  जिंदगी के साथ  चलती ही रही |

कभी बेफिक्र,कभी बेकस,कभी बेरंग ..... .



              "फिर रात "


फिर आ गयी है तू बेजुबान बन के 

कट गया है दिन, 'सख्त ' बेवफ़ा
फिर आ गयी है तू बियाँबान  बन के,

फिर आ गयी है तू ...

जला जाता हूँ तेरी चाँदनी से मैं
फिर आ गयी है तू इम्तेहान बन के,

फिर आ गयी है तू ....

जब्त साये हो गए सब, तेरा 'रुतबा'
फिर आ गयी है  तू शहान-ए-जहाँ बन के,

फिर आ गयी है तू ....



Tuesday, May 8, 2012

रोशनदान

कमरे के ऊँचे कोने पर
एक गंदला,छोटा
'जंगला' अनदेखा छूट गया है,
शायद कमरे में
रौशनी सबसे पहले
उसी से आया करती है,

फिर उपेक्षित ?
क्यूंकि उससे झांक नहीं सकते,
किसी को,कुछ भी ताक नही सकते
वो खिड़की नहीं है
शायद इसलिये |

फिर मौजूद क्यूँ है ?
जरूर
हमारे सपनों के कमरे का नज़रबट्टू ही होगा
पता नहीं किस बेवकूफ परिंदे ने उस पर
अपना घरौंदा बना लिया है,
शायद उसने
उसे अपना झरोखा मान लिया है |
 

Sunday, February 12, 2012

प्रस्ताव

क्लिष्ट है ,निर्द्रिष्ट है ,नित ,
है मगर प्रस्ताव फिर फिर ,
सोच हो ,सामर्थ्य हो , कर्तव्य हो ,
अब और विस्तृत ,और विस्तृत |

हो प्रद्योत नव प्रस्तावना,
फिर मर्म-गीता ज्ञात हो ,
संवेदना हो ,प्रेरणा हो ,कामना हो,
अब और विकसित ,और विकसित |

साक्षात् मंगल कल्पना हो,
हर प्राण का सन्दर्भ जानें,
सत्य हो ,व्यव्हार हो ,बोध हो,
अब और पोषित,और पोषित |

Saturday, December 31, 2011

लेखक की बीमारी


परसाई जी ने कहा है कि लेखक कि दो नहीं सौ आँखें होती हैं जी हाँ ,लोगों कि नज़रों में लेखक बड़ा ही विचित्र प्राणी होता है ,जब सौ आँखें होंगी तो पचास सिर भी होंगे कुछ विशेष वर्ग के लोगों का मानना ये भी है लेखक रावण से भी भयंकर होता है अजीरावण के तो सिर्फ दस ही सिर थे परन्तु तब भी वह मृत्यु का रहस्य जनता था ,प्रकाण्ड पंडित था (पंडित का अभिप्राय सिर्फ ज्ञानी ही समझें ,वर्ना मेरे घर पर कोर्ट का नोटिस भी आ सकता है ,नहीं नहीं  द्वेष भाव से नहीं कारण सिर्फ जनहित ही होता है ) तथापि वह कुटिलदिलफेंक आशिकअसत्य का प्रतिनिधिअड़ियल के साथ साथ बेवकूफ व राजनीति का ज्ञान न रखने वाला भी रहा होगा वर्ना वो लंका के प्रधानमंत्री को भेज सकता था और शिखर वार्ता से काम चला सकता था फिर युद्ध क्यूँ होता भला ,वैसे भी हम भारतवासी युगों युगों से शांति के ठेकेदार रहे हैं फिर भला ऐसी सुघड़ और और शांतिप्रिय छवि क्यूँ धूमिल होती |
फिर लेखकउसके तो पचास सिर और सौ ऑंखें बताई जातीं हैं उसका क्या कहना कुछ डॉक्टर जाति के लोगों का मानना है कि यह एक विसंगति है और लेखक इस विसंगति के साथ जीने के लिए अभिशप्त है ये डॉक्टर  एम.बी.बी.एस. पास नहीं होते ,ये शोधक होते हैं या कहिये ज्ञान शोधक होते हैं ये वर्षों खर्च (या वर्षों तक खर्च) करके साहित्यदर्शनसंस्कृति आदि में विशेष योग्यता प्राप्त करते हैं  मतलब की समाज के डॉक्टर होते हैं और चीर-फाड़ करने में सिद्ध-हस्त होते हैं |
मैं इस विसंगति की ख़बरें आये दिन अख़बारों मेंरेडियो और टेलिविज़न में पढ़ता, सुनता और देखता हूँ और मेरी उत्सुकता बेशरम के पौधे सी बढती ही जाती हैउत्सुकता ये है की उस विचित्र प्राणी के कितने हाथ हैं ?, कितने पेट हैं ?,कितनी आत्माएं हैं ?,क्या सभी पचास सिर एक ही दिशा में हवाखोरी करते हैं ?,क्या सभी के कर्म का सञ्चालन एक ही प्राण करता है ? | वे यह सब नहीं बताते ,सवालों से उन्हें अपच हो जाता है और जवाब मांगने पे दस्त लगने लगते हैंइसलिए वो हमे इन सवालों पर सिर्फ ठेंगा दिखाया करते हैं |
मैं इस बात पर उन डॉक्टरों और समाज के ठेकेदारों से खफा हूँ की वे रोग तो बताते हैं पर दवा नहीं बताते सिर्फ विसंगति-विसंगति चिल्लाते फिरते हैं उसका कोई कारण या इलाज नहीं बताते|
पहले घोषणा हुई थी कि ये शापित जाति आम जनता को संक्रमित कर सकती है अतः सावधानी बरतें ये भयावह बीमारी सीधे मस्तिष्क पे वार करती है अब कल ही फिर से एक नयी घोषणा कि गयी, बताया गया कि इस बीमारी कि टीके इजाद कर लिए गए हैं और हर प्रसूता को हिदायत दी गयी है कि ये टीके लगवा लें ताकि आने वाली पीढ़ी प्रतिरोधक क्षमता के साथ ही धरती पे आये और ये बीमारी और बीमार दोनों ही उनके साये से भी भागें वैसे कुछ भी कहिये है तो बीमारी ही जिन्हें लगना है उन्हें लग ही जाती है |
खबर है कि उस विचित्र प्राणी के कुछेक पांच सिरों(पचास में से) को क्रन्तिकारी घोषित किया गया है वे सरे-आम बीमारी फैलाने कि कोशिश करते पाए गए हैं उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है मामले कि जाँच के लिए कई डॉक्टरों का आयोग बनाया जायेगा और अभियोग चलेगा जाँच समिति अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी और संसद में इस पर गहन 'लोकतान्त्रिकचर्चा होगी और "बीमारी सफाचट" कानून बनाया जायेगा 
पर कानून तो अँधा होता हैउसे तो समाज के ठेकेदार राह बताते हैं और वो तो बहरे हैं और वे सिर्फ इतना जानते हैं कि मुजरिम कि जात ही शापित है ,इन्ही सब के बीच वो  क्रन्तिकारी अपने जान कुर्बान कर देने के सपनो को दिल में लेकर ही काल कोठरी में मर जाता है कितना कारगर है 'बीमारी सफाचटकानून, 'लोकतान्त्रिकढंग से बीमारी का सफाया हाय ! हमारा दुर्भाग्य जरा समाज कि संरचना तो देखिये कानून अँधा ,समाज के ठेकेदार बहरे  और जनता जस कि तस कुपोषित |

खैर बात आखों से शुरू हुई थी तो अंत भी उसी पर करते हैं ,अब क्या करूँ मैं भी पृथ्वीवासी हूँ ,जब उसका ही कोई छोर नहीं तो ये रचना तो तुच्छ ही है हाँ गोल भले ही हो पर चिकनी भी हो यह नहीं कह सकताअब प्राणी कि सौ आँखें है तो सब तो स्वस्थ होंगी नहींभई बीमारी का प्रभाव तो सब अंगो पर होगा सो कुछ में मोतिया-बिन्द कि शिकायत है,किसी में दृष्टीदोष हैकुछ बिरले अंधापन और रंतौंधी से भी पीड़ित हैं |
एक दिन हमारे ही जात भाई बिन बुलाये आ गए और कहने लगे कि उन्हें रतौंधी हो गया है मैंने कहा "यह तो बहुत बुरा हुआ "बोले अरे बुरा हो मेरे दुश्मनों का हम तो खूब मजे में हैंहमे अब शाम से दिखाई देना बंद हो जाता है  इसलिए हम अब कुछ भी कर सकते हैं फिर चाहे हम रात में किसी के भी घर घुस जाएँ और जो कुछ उसके घर खाने योग्य मिलेखा जाएँ समाज हमे माफ़ भी कर देता हैसमाज के ठेकेदार जनता को समझा देते हैं कि उस बेचारे को रतौंधी है शायद अपना घर पहचान न सका और दूसरे घर को अपना समझ लिया ऊपर से सहानुभूति मिलती है सो अलग' | इस रोग ने तो हमारे वारे न्यारे कर दिए मैं जड़ हो उसे घूरता रहा और वह यह कहते हुए उठ गया कि 'अब चलता हूँ साँझ ढलने को है ', और मैं हत-बुद्धि सा बीमारी में आनंद के सुराग ढूँढता रहा 








Saturday, December 3, 2011

हास्य-व्यंग


"लोल"

"मुखपुस्तिका"(फेसबुक)में "स्टेट्स" चेपते हुए
परायी "दीवारों" को देखते हुए
मन बार बार जा अटका
नज़रों में हर मर्तबा खटका
एक ही बोल
"लोल" ....?

अजी ये क्या बला है?,दिमाग चकराया
हमने फटाफट शब्दकोश खंगराया
अंग्रेजी साहित्य भी उठाई
पर "लोल" की पोल नहीं पाई

रात भर सो नहीं पाया
जब सुबह दुखड़ा मित्रों को सुनाया
उन्होंने ने ऐसी खिल्ली उड़ाई
हमे शेख चिल्ली की उपाधि पकड़ाई

किसी तरह उन्होंने
हँसी को जब्त किया
हमारे अज्ञान पे दो मिनट
का मौन व्यक्त किया
फिर बोले, अरे बौडम!
ये आधुनिक हास्य का पर्याय है
हँसी का तथाकथित उपाय है
हर समस्या के समाधान का
गोल-गोल अभिप्राय है, लोल
अब बोल

हम बोले तो हा-हा में क्या दिक्कत है?
वो तो हमारी पुरानी आदत है
हमारी सांस्कृतिक विरासत है
उससे तुम्हे क्यों अदावत है ?

बोले ,तुम्हे तो 'क्रिटिक' होना चाहिए
लगता है तुम्हे 'डिप्लोमेटिक' उत्तर चाहिए
देखो ,हा-हा बड़ा ही 'औड' है
"लोल" का कांसेप्ट ज़रा 'ब्रौड' है

क्या आप कभी बहुवचन में हँसे हैं ?
क्या हँसने की 'फील' में घुसे हैं
"लोल्ज़" में यह सब 'पोसिबल' है
हँसने के साथ साथ हमारी सोच का
दोगलापन भी "अप्लोसिबल" है

"लोल" सर्वस्व है व्यापक है
हमारी प्रगति का मापक है
तो इसकी माहिमा को स्वीकार कीजिए
और अपनी आधुनिता का विस्तार किजिए |