आदत, अंग्रेजी
में ‘हेबिट’ यानि किसी क्रिया के पुनः
पुनः होने या करने से उसके स्वाभाविक रूप से स्वीकार्य होने को ही शायद आदत कहते
हैं, अगर नहीं तो भगवान व पाठक मेरी मानसिक भित्ति की
दुर्बलता को क्षमा करें | वैसे आदत बड़ा ही रोचक ‘विषय’ हमेशा से रहा है और शायद हमेशा रहेगा किन्तु
आदत शब्द अपने आप में बड़ा ही नीरस व गैरजिम्मेदाराना प्रतीत होता है क्यूंकि अक्सर
इस शब्द के प्रयोग से क्रिया के कारण का लोप अनायास ही हो जाता है | वक्ता के लिए यह दुनियावालों के अनेकानेक प्रश्नों का सदा सरल और यदा कदा
आश्वस्त करने वाला रामबाण जवाब
होता
है |
रोज़मर्रा
की जिंदगी में “जी उनकी तो सुबह उठने की ही आदत है”, “अजी इनकी तो
आदत ही है की ये सुबह सिर्फ चाय पीते है ,और दोपहर को दांत
माँझ कर सीधे खाना खाते हैं”, “शर्मा जी की तो आदत है की वो
दूसरों के फटे में जरूर टांग अड़ाते हैं”, “आपको तो पता ही है की रमेश आदतन जुआरी है” आदि न जाने कितने
ही ऐसे मुहावरे हमसे टकराते हैं और अगर आप आदत होने का कारण लोगों से पूँछ लें तो
आपको लोग आपको ऐसे आँखे तरेर कर देखेंगे जैसे आपने उपहास की नियत से ये प्रश्न
पूछा हो |
आदत
अपने आप में सम्पूर्ण है | इसकी कोई वजह नहीं होती ये बस होती है आप पूरी जान लगा कर कोशिश कर लें
क्या मजाल जो आप किसी ‘लॉजिकल कांक्लुजन’ पर सहमत क्या पहुँच भी पायें तो |
और
तो और जन मानस में आदत की वजह न होने का कोंसेप्ट इतना अंडरस्टुड व सर्वमान्य है
की महान आर्यावर्त प्रदेश जो की एक बातचीत अथवा चर्चा प्रधान देश है(कृषि प्रधान
है या नहीं इस विषय में अधिक जानकारी के लिए अपने नजदीकी आर.टी.आई केन्द्र पर
संपर्क करें ), जिसके जन जन में यानि ‘टॉप टू बॉटम’ अनगिनत नैसर्गिक आदतों का वास है , में ‘आदत’ चर्चा का विषय नहीं है | आप
२४ घंटे के निरंतर सबसे तेज बातचीत करने वाले चैनल्स से लेकर हमारे पुरातन ‘दूभर दर्शन’ तक खंगाल डालें , इनमें
आपको मसालेदार स्टिंग,नारी सशक्तिकरण से लेकर फूहड़
गाने(महिमा मंडित),फलां का शयन कक्ष तक चर्चा का विषय हैं पर
‘आदत’ गायब है |
इस
नाइंसाफी से में व्यथित हुआ और परेशान भी ,मुफ्त में बेज्ज़ती हुई सो अलग
ने, असल में हुआ यूँ की अपनी पहुंच के अनुसार मैंने अपने नगर
के एक छुटभैये इस एक सवाल कर डाला |
इस
पर उसने मुझे डपट कर कहा : अबे ! तू है कौन और ये क्या ‘आदत-
आदत’ लगा रखा है ,चल भाग यहाँ से |
इसपे
उसके एक चेले ने जो पेशे से प्राइवेट गाइड है , ने चुटकी ली : “जी ‘आदतनामा’ लिखेंगे जनाब ‘आदतुल’ फज़ल” |
कभी
कभी ये भ्रम भी हुआ की ये ‘आदत’ को भारतीय संस्कृति की तरह नज़रअंदाज़ करने की
शाजिश है |
मैं
इसके विरोध में जंतर मंतर जाकर अनशन करने ही वाला था की उसी रात एक वरिष्ठ पत्रकार
ने स्वप्न में मुझे दर्शन दिया और फिर से ‘दर्शन’(दर्शनशास्त्र
वाला ) दिया |
वे
बोले ‘ अबे गधे, आदत सर्व्यापक है और तेरी समझ से परे है |
तू आदत की चर्चा न होने से परेशान है ,जबकि
यहाँ सभी को चर्चा की आदत है | चर्चा , आदत का उपोत्पाद है यानि की एक बाई प्रोडक्ट है और क्या गारंटी है की जिनके
साथ मिलकर तू अनशन पर बैठेगा उन्हें अनशन की आदत नहीं है ? यह
कह कर वे अंतर्ध्यान हो गए |
मुझे
अपने प्रश्न का शायद उत्तर मिला भी और नहीं भी, लेकिन अनशन का खयाल मन से जरूर
जाता रहा |
गौर
से देखने पे आप पाएंगे कि आदतें बड़ी ‘विविध’ होती
हैं वैसे इनके वर्गीकरण में तो कौटिल्य को भी
पसीने आ जायेंगे, ये सिर्फ व्यक्ति विशेष की ही नहीं सामूहिक
भी हैं जैसे नेताओं की आदत, अभिनेताओं की आदत, समाज सुधारकों की आदत, दुकानदारी की आदत, पडोसियों की आदत | न्यूज़ चैनलों से लेकर सरकारी आदतें बाज़ार में देखने को आसानी से मिलतीं हैं |
खैर
जो भी हो, आदतें हमारे कर्म के रूप में ही दुनिया में आती हैं, जिसका सीधा मतलब है की ये हमारा स्वर्ग-नर्क तय कर सकती हैं तो हमे चाहिए
कि समय रहते इनको पहचान लें और अपना परलोक बचा लें|
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