क्लिष्ट है ,निर्द्रिष्ट है ,नित ,
है मगर प्रस्ताव फिर फिर ,
सोच हो ,सामर्थ्य हो , कर्तव्य हो ,
अब और विस्तृत ,और विस्तृत |
हो प्रद्योत नव प्रस्तावना,
फिर मर्म-गीता ज्ञात हो ,
संवेदना हो ,प्रेरणा हो ,कामना हो,
अब और विकसित ,और विकसित |
साक्षात् मंगल कल्पना हो,
हर प्राण का सन्दर्भ जानें,
सत्य हो ,व्यव्हार हो ,बोध हो,
अब और पोषित,और पोषित |