Saturday, December 31, 2011

लेखक की बीमारी


परसाई जी ने कहा है कि लेखक कि दो नहीं सौ आँखें होती हैं जी हाँ ,लोगों कि नज़रों में लेखक बड़ा ही विचित्र प्राणी होता है ,जब सौ आँखें होंगी तो पचास सिर भी होंगे कुछ विशेष वर्ग के लोगों का मानना ये भी है लेखक रावण से भी भयंकर होता है अजीरावण के तो सिर्फ दस ही सिर थे परन्तु तब भी वह मृत्यु का रहस्य जनता था ,प्रकाण्ड पंडित था (पंडित का अभिप्राय सिर्फ ज्ञानी ही समझें ,वर्ना मेरे घर पर कोर्ट का नोटिस भी आ सकता है ,नहीं नहीं  द्वेष भाव से नहीं कारण सिर्फ जनहित ही होता है ) तथापि वह कुटिलदिलफेंक आशिकअसत्य का प्रतिनिधिअड़ियल के साथ साथ बेवकूफ व राजनीति का ज्ञान न रखने वाला भी रहा होगा वर्ना वो लंका के प्रधानमंत्री को भेज सकता था और शिखर वार्ता से काम चला सकता था फिर युद्ध क्यूँ होता भला ,वैसे भी हम भारतवासी युगों युगों से शांति के ठेकेदार रहे हैं फिर भला ऐसी सुघड़ और और शांतिप्रिय छवि क्यूँ धूमिल होती |
फिर लेखकउसके तो पचास सिर और सौ ऑंखें बताई जातीं हैं उसका क्या कहना कुछ डॉक्टर जाति के लोगों का मानना है कि यह एक विसंगति है और लेखक इस विसंगति के साथ जीने के लिए अभिशप्त है ये डॉक्टर  एम.बी.बी.एस. पास नहीं होते ,ये शोधक होते हैं या कहिये ज्ञान शोधक होते हैं ये वर्षों खर्च (या वर्षों तक खर्च) करके साहित्यदर्शनसंस्कृति आदि में विशेष योग्यता प्राप्त करते हैं  मतलब की समाज के डॉक्टर होते हैं और चीर-फाड़ करने में सिद्ध-हस्त होते हैं |
मैं इस विसंगति की ख़बरें आये दिन अख़बारों मेंरेडियो और टेलिविज़न में पढ़ता, सुनता और देखता हूँ और मेरी उत्सुकता बेशरम के पौधे सी बढती ही जाती हैउत्सुकता ये है की उस विचित्र प्राणी के कितने हाथ हैं ?, कितने पेट हैं ?,कितनी आत्माएं हैं ?,क्या सभी पचास सिर एक ही दिशा में हवाखोरी करते हैं ?,क्या सभी के कर्म का सञ्चालन एक ही प्राण करता है ? | वे यह सब नहीं बताते ,सवालों से उन्हें अपच हो जाता है और जवाब मांगने पे दस्त लगने लगते हैंइसलिए वो हमे इन सवालों पर सिर्फ ठेंगा दिखाया करते हैं |
मैं इस बात पर उन डॉक्टरों और समाज के ठेकेदारों से खफा हूँ की वे रोग तो बताते हैं पर दवा नहीं बताते सिर्फ विसंगति-विसंगति चिल्लाते फिरते हैं उसका कोई कारण या इलाज नहीं बताते|
पहले घोषणा हुई थी कि ये शापित जाति आम जनता को संक्रमित कर सकती है अतः सावधानी बरतें ये भयावह बीमारी सीधे मस्तिष्क पे वार करती है अब कल ही फिर से एक नयी घोषणा कि गयी, बताया गया कि इस बीमारी कि टीके इजाद कर लिए गए हैं और हर प्रसूता को हिदायत दी गयी है कि ये टीके लगवा लें ताकि आने वाली पीढ़ी प्रतिरोधक क्षमता के साथ ही धरती पे आये और ये बीमारी और बीमार दोनों ही उनके साये से भी भागें वैसे कुछ भी कहिये है तो बीमारी ही जिन्हें लगना है उन्हें लग ही जाती है |
खबर है कि उस विचित्र प्राणी के कुछेक पांच सिरों(पचास में से) को क्रन्तिकारी घोषित किया गया है वे सरे-आम बीमारी फैलाने कि कोशिश करते पाए गए हैं उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है मामले कि जाँच के लिए कई डॉक्टरों का आयोग बनाया जायेगा और अभियोग चलेगा जाँच समिति अपनी रिपोर्ट तैयार करेगी और संसद में इस पर गहन 'लोकतान्त्रिकचर्चा होगी और "बीमारी सफाचट" कानून बनाया जायेगा 
पर कानून तो अँधा होता हैउसे तो समाज के ठेकेदार राह बताते हैं और वो तो बहरे हैं और वे सिर्फ इतना जानते हैं कि मुजरिम कि जात ही शापित है ,इन्ही सब के बीच वो  क्रन्तिकारी अपने जान कुर्बान कर देने के सपनो को दिल में लेकर ही काल कोठरी में मर जाता है कितना कारगर है 'बीमारी सफाचटकानून, 'लोकतान्त्रिकढंग से बीमारी का सफाया हाय ! हमारा दुर्भाग्य जरा समाज कि संरचना तो देखिये कानून अँधा ,समाज के ठेकेदार बहरे  और जनता जस कि तस कुपोषित |

खैर बात आखों से शुरू हुई थी तो अंत भी उसी पर करते हैं ,अब क्या करूँ मैं भी पृथ्वीवासी हूँ ,जब उसका ही कोई छोर नहीं तो ये रचना तो तुच्छ ही है हाँ गोल भले ही हो पर चिकनी भी हो यह नहीं कह सकताअब प्राणी कि सौ आँखें है तो सब तो स्वस्थ होंगी नहींभई बीमारी का प्रभाव तो सब अंगो पर होगा सो कुछ में मोतिया-बिन्द कि शिकायत है,किसी में दृष्टीदोष हैकुछ बिरले अंधापन और रंतौंधी से भी पीड़ित हैं |
एक दिन हमारे ही जात भाई बिन बुलाये आ गए और कहने लगे कि उन्हें रतौंधी हो गया है मैंने कहा "यह तो बहुत बुरा हुआ "बोले अरे बुरा हो मेरे दुश्मनों का हम तो खूब मजे में हैंहमे अब शाम से दिखाई देना बंद हो जाता है  इसलिए हम अब कुछ भी कर सकते हैं फिर चाहे हम रात में किसी के भी घर घुस जाएँ और जो कुछ उसके घर खाने योग्य मिलेखा जाएँ समाज हमे माफ़ भी कर देता हैसमाज के ठेकेदार जनता को समझा देते हैं कि उस बेचारे को रतौंधी है शायद अपना घर पहचान न सका और दूसरे घर को अपना समझ लिया ऊपर से सहानुभूति मिलती है सो अलग' | इस रोग ने तो हमारे वारे न्यारे कर दिए मैं जड़ हो उसे घूरता रहा और वह यह कहते हुए उठ गया कि 'अब चलता हूँ साँझ ढलने को है ', और मैं हत-बुद्धि सा बीमारी में आनंद के सुराग ढूँढता रहा 








Saturday, December 3, 2011

हास्य-व्यंग


"लोल"

"मुखपुस्तिका"(फेसबुक)में "स्टेट्स" चेपते हुए
परायी "दीवारों" को देखते हुए
मन बार बार जा अटका
नज़रों में हर मर्तबा खटका
एक ही बोल
"लोल" ....?

अजी ये क्या बला है?,दिमाग चकराया
हमने फटाफट शब्दकोश खंगराया
अंग्रेजी साहित्य भी उठाई
पर "लोल" की पोल नहीं पाई

रात भर सो नहीं पाया
जब सुबह दुखड़ा मित्रों को सुनाया
उन्होंने ने ऐसी खिल्ली उड़ाई
हमे शेख चिल्ली की उपाधि पकड़ाई

किसी तरह उन्होंने
हँसी को जब्त किया
हमारे अज्ञान पे दो मिनट
का मौन व्यक्त किया
फिर बोले, अरे बौडम!
ये आधुनिक हास्य का पर्याय है
हँसी का तथाकथित उपाय है
हर समस्या के समाधान का
गोल-गोल अभिप्राय है, लोल
अब बोल

हम बोले तो हा-हा में क्या दिक्कत है?
वो तो हमारी पुरानी आदत है
हमारी सांस्कृतिक विरासत है
उससे तुम्हे क्यों अदावत है ?

बोले ,तुम्हे तो 'क्रिटिक' होना चाहिए
लगता है तुम्हे 'डिप्लोमेटिक' उत्तर चाहिए
देखो ,हा-हा बड़ा ही 'औड' है
"लोल" का कांसेप्ट ज़रा 'ब्रौड' है

क्या आप कभी बहुवचन में हँसे हैं ?
क्या हँसने की 'फील' में घुसे हैं
"लोल्ज़" में यह सब 'पोसिबल' है
हँसने के साथ साथ हमारी सोच का
दोगलापन भी "अप्लोसिबल" है

"लोल" सर्वस्व है व्यापक है
हमारी प्रगति का मापक है
तो इसकी माहिमा को स्वीकार कीजिए
और अपनी आधुनिता का विस्तार किजिए |

Saturday, November 26, 2011

क्षणिकाएँ


कर्तव्य
हुई भोर
झींगुर का शोर,
अलसाई आखें लिए
"चल घर चलें अब"
कहता है बार बार,
गाँव का चौकीदार.........

प्रश्न 
 फिर बरस गया चितचोर,
प्रियतम चंद्रमा,
तू भी दूर....
जंगल नाचा मोर,
आद्र नयन कोर,
किसने देखा ?

उत्तर
श्याम आये,
सावन लिए
मेह बरसे नयन भी,
हुई दूर कुरूपता
संसार से भी मन से भी....


आशाएँ
दो घरौंदे
पड़ौसी,
ये वो है 
कभी वो ये होता है,
कभी एक की चटनी
तो दूजे की खीर हो,
चाहे असंख्य बाधाएं
पर राह के उस पार हैं,
दोनों की आशाएँ
दोनों समान्तर रेखाएं...

Tuesday, November 22, 2011

मंथन

क्यूँ अचानक
हो रहा कितने विचारों
का समागम ,अंगुठन,
आह ! खोता जा रहा
अंतः हृदय का सन्तुलन,

हो रहीं अज्ञात सी
सब इन्द्रियां ,ज्ञानेन्द्रियाँ ,
क्या स्वयं का है पतन ?
या कोई अग्नि-प्रज्वलन,

होम होता जा रहा सब
चाहे शिथिल हो सख्त हो,
हों विसर्जित अवशेष भी
पूर्ण हो अब भ्रान्ति-तर्पण,

हो हलाहल पान अब
शिव समर्पण,अनुकरण,
प्रारब्ध हो उत्थान अब
आरम्भ हो गंभीर चिंतन !

शिव ही दिखे हर प्राण में
शिव हो सत्यम ,सुन्दरम ,
विश्वास की प्रस्तर शिला पे
है सभी का आवहन,है सभी का आवहन,है सभी का आवहन....

Monday, November 21, 2011

आशा पाती


घिर आया घनघोर सघन मन, 
उत्प्लावित अपार जलराशि 
होता राज्य तिमिर का विस्तरित,
नयन ज्योति अन्धराई जाती 

विश्व हृदय तम से आच्छादित,
शंका चपल तड़ित सी आती
दृश्य भयावह भीषण प्रस्तुत,
हृदय गति पथराई जाती

व्यथित, दुखित यात्री मन संचित,
चीत्कार भर्राई आती 
हाय ! प्रलयंकारी विपदा यह,
शुष्क शिराओं को कर जाती
 
फिर भी एक पुंज प्रकाशित ,
आशा जिसकी अभिलाषी
नव चेतन पल्लवित करती ,
इंदु प्रेषित आशा पाती... ..

INTRODUCTION(परिचय)

As the name suggests ABHIVYAKTI(अभिव्यक्ति)-means to 'Express'.
To express freely what we feel,what we see,what we want,our expectations,complaints,anger,love,anything or everything .So this is the place where you will find the variety of expressions .This is a small step i have taken to express myself and the things which are close to my heart.I seek your valuable support,comments and suggestion.Feel free to write to me if you want to share your thoughts and expressions.


अभिव्यक्ति - अर्थात उन विचारों का सम्प्रेषण जो प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व के कारण,स्वाभाव के कारण अनायास ही व्यक्त हो जाते हैं |
हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी में न जाने कितने ही भाव,विचार, संवेदनाएँ आते-जाते रहते हैं और हमारी व्यस्तता के चक्रव्यूह में कितने ही गंभीर चिंतन यूँ ही लोप हो जाते हैं | अभिव्यक्ति एक छोटा सा व्यक्तिगत प्रयास है| आपके सुझाव ,विचार और टिप्पणीयाँ सादर आमंत्रित हैं |