न कोई शौक, न किस्से, न यादें ही रहीं,
बेरंग मुक्कदर से मेरे इश्क भी जाता रहा,
कुछेक जज़्बात ही बचे थे दिल-ए-महरूम में मेरे,
मगर अफ़सोस की उनको भी जुबाँ मैं दे न सका |
न कोई गम, न शिकायत, न शिकवा ही रहा,
वफ़ा-ए-मय से मेरा होश भी जाता रहा ,
चंद अश्क-ए-बर्बाद ही रह गए थे पलकों पे मेरे ,
मगर अफ़सोस की उनको भी पनाह मैं दे न सका |
न कोई चेहरा, न शख्शियत, न हस्ती ही रही,
हरेक आईने से मेरा अक्स भी जाता रहा,
हाँ थे बहुत अफ़सोस इस उम्र-ए-सफर के !
मगर अफ़सोस की उस शर्म को भी मैं धो न सका |
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