Tuesday, December 18, 2012

अफ़सोस


न कोई शौक, न किस्से, न यादें ही रहीं,
बेरंग मुक्कदर से मेरे इश्क भी जाता रहा,
कुछेक जज़्बात ही बचे थे दिल-ए-महरूम में मेरे,
मगर अफ़सोस की उनको भी जुबाँ मैं दे न सका |

न कोई गम, न शिकायत, न शिकवा ही रहा,
वफ़ा-ए-मय से मेरा होश भी जाता रहा ,
चंद अश्क-ए-बर्बाद ही रह गए थे पलकों पे मेरे ,
मगर अफ़सोस की उनको भी पनाह मैं दे न सका |

न कोई चेहरा, न शख्शियत, न हस्ती ही रही,
हरेक आईने से मेरा अक्स भी जाता रहा,
हाँ थे बहुत अफ़सोस इस उम्र-ए-सफर के !
मगर अफ़सोस की उस शर्म को भी मैं धो न सका |

Monday, May 28, 2012

उर्दू कोना


                  "आवारगी"


मिसरा :- आवारगी  इस शख्शियत  में ऐसे फ़ना कुछ हो गयी,
             रंज-ओ-गम भी अब मेरे खानाबदोश हो गए ||

जिंदगी आवारगी की राह पे चलती रही,
कभी बेफिक्र ,कभी बेकस,कभी बेरंग  सी होती रही |

वहम  कितने ही टूटे कांच  से,उतने ही फिर फिर बन गए,
हिम्मत  भी टूटी,पैदा हुए कुछ  शौक भी, (उसकी इनायत )
ज़िल्लत  मगर फिर भी रही और साँस  भी चलती रही |

रास्तों की खाक  कुछ अपनी लगी,कुछ गैर थी, 
बेहिस हुए फ़ितना,कुछ पल  को फुर्सत  भी मिली, 
रहमत  खुदा की भी रही और बेखुदी बढती रही | 

कशमकश  ही कशमकश  ए  कमबख्त फ़ितरत-ए-जिंदगी,
के  ता-उम्र  मौत  जिंदगी के साथ  चलती ही रही |

कभी बेफिक्र,कभी बेकस,कभी बेरंग ..... .



              "फिर रात "


फिर आ गयी है तू बेजुबान बन के 

कट गया है दिन, 'सख्त ' बेवफ़ा
फिर आ गयी है तू बियाँबान  बन के,

फिर आ गयी है तू ...

जला जाता हूँ तेरी चाँदनी से मैं
फिर आ गयी है तू इम्तेहान बन के,

फिर आ गयी है तू ....

जब्त साये हो गए सब, तेरा 'रुतबा'
फिर आ गयी है  तू शहान-ए-जहाँ बन के,

फिर आ गयी है तू ....



Tuesday, May 8, 2012

रोशनदान

कमरे के ऊँचे कोने पर
एक गंदला,छोटा
'जंगला' अनदेखा छूट गया है,
शायद कमरे में
रौशनी सबसे पहले
उसी से आया करती है,

फिर उपेक्षित ?
क्यूंकि उससे झांक नहीं सकते,
किसी को,कुछ भी ताक नही सकते
वो खिड़की नहीं है
शायद इसलिये |

फिर मौजूद क्यूँ है ?
जरूर
हमारे सपनों के कमरे का नज़रबट्टू ही होगा
पता नहीं किस बेवकूफ परिंदे ने उस पर
अपना घरौंदा बना लिया है,
शायद उसने
उसे अपना झरोखा मान लिया है |
 

Sunday, February 12, 2012

प्रस्ताव

क्लिष्ट है ,निर्द्रिष्ट है ,नित ,
है मगर प्रस्ताव फिर फिर ,
सोच हो ,सामर्थ्य हो , कर्तव्य हो ,
अब और विस्तृत ,और विस्तृत |

हो प्रद्योत नव प्रस्तावना,
फिर मर्म-गीता ज्ञात हो ,
संवेदना हो ,प्रेरणा हो ,कामना हो,
अब और विकसित ,और विकसित |

साक्षात् मंगल कल्पना हो,
हर प्राण का सन्दर्भ जानें,
सत्य हो ,व्यव्हार हो ,बोध हो,
अब और पोषित,और पोषित |