Monday, May 28, 2012

उर्दू कोना


                  "आवारगी"


मिसरा :- आवारगी  इस शख्शियत  में ऐसे फ़ना कुछ हो गयी,
             रंज-ओ-गम भी अब मेरे खानाबदोश हो गए ||

जिंदगी आवारगी की राह पे चलती रही,
कभी बेफिक्र ,कभी बेकस,कभी बेरंग  सी होती रही |

वहम  कितने ही टूटे कांच  से,उतने ही फिर फिर बन गए,
हिम्मत  भी टूटी,पैदा हुए कुछ  शौक भी, (उसकी इनायत )
ज़िल्लत  मगर फिर भी रही और साँस  भी चलती रही |

रास्तों की खाक  कुछ अपनी लगी,कुछ गैर थी, 
बेहिस हुए फ़ितना,कुछ पल  को फुर्सत  भी मिली, 
रहमत  खुदा की भी रही और बेखुदी बढती रही | 

कशमकश  ही कशमकश  ए  कमबख्त फ़ितरत-ए-जिंदगी,
के  ता-उम्र  मौत  जिंदगी के साथ  चलती ही रही |

कभी बेफिक्र,कभी बेकस,कभी बेरंग ..... .



              "फिर रात "


फिर आ गयी है तू बेजुबान बन के 

कट गया है दिन, 'सख्त ' बेवफ़ा
फिर आ गयी है तू बियाँबान  बन के,

फिर आ गयी है तू ...

जला जाता हूँ तेरी चाँदनी से मैं
फिर आ गयी है तू इम्तेहान बन के,

फिर आ गयी है तू ....

जब्त साये हो गए सब, तेरा 'रुतबा'
फिर आ गयी है  तू शहान-ए-जहाँ बन के,

फिर आ गयी है तू ....



Tuesday, May 8, 2012

रोशनदान

कमरे के ऊँचे कोने पर
एक गंदला,छोटा
'जंगला' अनदेखा छूट गया है,
शायद कमरे में
रौशनी सबसे पहले
उसी से आया करती है,

फिर उपेक्षित ?
क्यूंकि उससे झांक नहीं सकते,
किसी को,कुछ भी ताक नही सकते
वो खिड़की नहीं है
शायद इसलिये |

फिर मौजूद क्यूँ है ?
जरूर
हमारे सपनों के कमरे का नज़रबट्टू ही होगा
पता नहीं किस बेवकूफ परिंदे ने उस पर
अपना घरौंदा बना लिया है,
शायद उसने
उसे अपना झरोखा मान लिया है |