"आवारगी"
मिसरा :- आवारगी इस शख्शियत में ऐसे फ़ना कुछ हो गयी,
रंज-ओ-गम भी अब मेरे खानाबदोश हो गए ||
जिंदगी आवारगी की राह पे चलती रही,
कभी बेफिक्र ,कभी बेकस,कभी बेरंग सी होती रही |
वहम कितने ही टूटे कांच से,उतने ही फिर फिर बन गए,
हिम्मत भी टूटी,पैदा हुए कुछ शौक भी, (उसकी इनायत )
ज़िल्लत मगर फिर भी रही और साँस भी चलती रही |
रास्तों की खाक कुछ अपनी लगी,कुछ गैर थी,
बेहिस हुए फ़ितना,कुछ पल को फुर्सत भी मिली,
रहमत खुदा की भी रही और बेखुदी बढती रही |
कशमकश ही कशमकश ए कमबख्त फ़ितरत-ए-जिंदगी,
के ता-उम्र मौत जिंदगी के साथ चलती ही रही |
कभी बेफिक्र,कभी बेकस,कभी बेरंग ..... .
"फिर रात "
फिर आ गयी है तू बेजुबान बन के
कट गया है दिन, 'सख्त ' बेवफ़ा
फिर आ गयी है तू बियाँबान बन के,
फिर आ गयी है तू ...
जला जाता हूँ तेरी चाँदनी से मैं
फिर आ गयी है तू इम्तेहान बन के,
फिर आ गयी है तू ....
जब्त साये हो गए सब, तेरा 'रुतबा'
फिर आ गयी है तू शहान-ए-जहाँ बन के,
फिर आ गयी है तू ....