क्यूँ अचानक
हो रहा कितने विचारों
का समागम ,अंगुठन,
आह ! खोता जा रहा
अंतः हृदय का सन्तुलन,
हो रहीं अज्ञात सी
सब इन्द्रियां ,ज्ञानेन्द्रियाँ ,
क्या स्वयं का है पतन ?
या कोई अग्नि-प्रज्वलन,
होम होता जा रहा सब
चाहे शिथिल हो सख्त हो,
हों विसर्जित अवशेष भी
पूर्ण हो अब भ्रान्ति-तर्पण,
हो हलाहल पान अब
शिव समर्पण,अनुकरण,
प्रारब्ध हो उत्थान अब
आरम्भ हो गंभीर चिंतन !
शिव ही दिखे हर प्राण में
शिव हो सत्यम ,सुन्दरम ,
विश्वास की प्रस्तर शिला पे
है सभी का आवहन,है सभी का आवहन,है सभी का आवहन....
हो रहा कितने विचारों
का समागम ,अंगुठन,
आह ! खोता जा रहा
अंतः हृदय का सन्तुलन,
हो रहीं अज्ञात सी
सब इन्द्रियां ,ज्ञानेन्द्रियाँ ,
क्या स्वयं का है पतन ?
या कोई अग्नि-प्रज्वलन,
होम होता जा रहा सब
चाहे शिथिल हो सख्त हो,
हों विसर्जित अवशेष भी
पूर्ण हो अब भ्रान्ति-तर्पण,
हो हलाहल पान अब
शिव समर्पण,अनुकरण,
प्रारब्ध हो उत्थान अब
आरम्भ हो गंभीर चिंतन !
शिव ही दिखे हर प्राण में
शिव हो सत्यम ,सुन्दरम ,
विश्वास की प्रस्तर शिला पे
है सभी का आवहन,है सभी का आवहन,है सभी का आवहन....
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